Gita→Chapter 7→Verse 13

Gita 7.13

Jnana Vijnana Yoga

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् | मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ||१३||

tribhir guṇamayair bhāvair ebhiḥ sarvam idaṁ jagat | mohitaṁ nābhijānāti mām ebhyaḥ param avyayam ||13||

In essence: The world sleeps in a trance of three colors—sattva, rajas, tamas—never suspecting the colorless Awareness that holds the whole dream.

A conversation between a seeker and guide to help you feel this verse deeply

Sadhak-Guru Dialogue

साधक: "गुरुदेव, कृष्ण कहते हैं संसार तीन गुणों से मोहित है। पर क्या कोई ऐसा है जो मोहित नहीं है?"

गुरु: "अभी तुम्हारे मन में ये प्रश्न उठा—ये किस गुण का प्रभाव था?"

साधक: "शायद सत्त्व का। जिज्ञासा तो सात्त्विक ही होती है।"

गुरु: "बिल्कुल सही। अब बताओ—जिसने ये जिज्ञासा देखी, जाना कि 'ये सत्त्व है'—वो कौन था?"

साधक: "वो... मैं था। मेरी चेतना।"

गुरु: "और वो चेतना सात्त्विक थी, राजसिक थी, या तामसिक?"

साधक: "कोई नहीं! वो तो बस देख रही थी—उसका कोई रंग नहीं था।"

गुरु: "यही 'परम अव्यय' है जिसकी ओर कृष्ण इशारा करते हैं। वो अनंत आकाश जिसमें तीनों गुणों के बादल आते-जाते हैं।"

साधक: "पर गुरुदेव, अगर चेतना हमेशा वहाँ है, तो हम उसे क्यों नहीं जानते?"

गुरु: "क्योंकि तुम फिल्म में इतने खोए हो कि पर्दे को भूल गए। हर अनुभव—सुख, दुख, स्पष्टता, भ्रम—ये सब गुणों का खेल है। और तुम इसी खेल में उलझे रहते हो।"

साधक: "तो क्या सत्त्व में रहना भी बंधन है? मैंने तो सोचा था आध्यात्मिक साधना सत्त्व बढ़ाने के लिए है।"

गुरु: "सत्त्व साधन है, साध्य नहीं। सात्त्विक मन पारदर्शी होता है—उससे परम सत्य झलकता है। पर अगर तुम सत्त्व में ही रुक गए, तो सुनहरी जंजीर भी जंजीर ही है।"

साधक: "समझ गया। लक्ष्य गुणों को पार करना है, किसी एक गुण में स्थिर होना नहीं।"

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🌅 Daily Practice

🌅 Morning

'गुण-साक्षी ध्यान' का अभ्यास करें। आँखें बंद करके बैठें और भीतर देखें—अभी मन किस गुण में है? सात्त्विक (शांत, स्पष्ट)? राजसिक (बेचैन, योजनाएँ बनाता)? तामसिक (सुस्त, धुंधला)? जो भी हो, बस पहचानें। फिर प्रश्न करें: 'जो इसे पहचान रहा है, वो किस गुण में है?' इस प्रश्न में रुकें। साक्षी की झलक मिलेगी जो गुणों से परे है। इसी साक्षी में 5-10 मिनट विश्राम करें।

☀️ Daytime

दिन में तीन बार 'गुण-जाँच' करें—सुबह 11 बजे, दोपहर 3 बजे, शाम 7 बजे। जो भी कर रहे हों, एक क्षण रुकें और पहचानें: अभी कौन सा गुण प्रधान है? क्या मैं सात्त्विक स्पष्टता में काम कर रहा हूँ, राजसिक जल्दबाजी में, या तामसिक टालमटोल में? पहचानने मात्र से एक दूरी बन जाती है। आप गुण में डूबे नहीं रहते, उसे देखने लगते हैं। यही 'अभिजानाति'—जानना—की शुरुआत है।

🌙 Evening

सोने से पहले 'गुण-समीक्षा' करें। दिन को याद करें: कब सत्त्व था (स्पष्ट निर्णय, शांत कार्य)? कब रजस (जल्दबाजी, प्रतिस्पर्धा, तनाव)? कब तमस (आलस्य, टालना, भ्रम)? निर्णय न करें, बस देखें। फिर स्मरण करें: पूरे दिन, हर गुण में, एक साक्षी था जो बदला नहीं। सुबह की शांति में भी वही था, दोपहर की भागदौड़ में भी, शाम की थकान में भी। उस अपरिवर्तनीय साक्षी को प्रणाम करके सोएँ।

Common Questions

अगर सब कुछ गुणों का खेल है, तो क्या मेरी आध्यात्मिक खोज भी सिर्फ सत्त्व गुण है? क्या मुक्ति की इच्छा भी माया है?
हाँ और नहीं। प्रारंभ में आध्यात्मिक जिज्ञासा सत्त्व गुण से उत्पन्न होती है। पर जैसे-जैसे साधना गहरी होती है, वो स्वयं को पार कर जाती है। जैसे सीढ़ी छत तक पहुँचाती है पर छत पर सीढ़ी की जरूरत नहीं। सत्त्व वो द्वार है जो गुणातीत में खुलता है। इच्छा माया है, पर इच्छा का अंत करने वाली इच्छा एक विशेष इच्छा है—जो स्वयं को समाप्त करके मुक्त करती है।
कृष्ण कहते हैं 'सर्वं जगत्'—पूरा संसार मोहित है। क्या कोई अपवाद नहीं? ज्ञानी लोग, संत, अवतार?
जब तक कोई शरीर में है, गुण कार्य करते रहते हैं। भेद यह है कि ज्ञानी गुणों के साक्षी होते हैं, उनमें खोए नहीं होते। उनके शरीर-मन में भी भूख लगती है, नींद आती है, क्रोध उठता है—पर वे जानते हैं कि 'मैं' इनसे परे हूँ। मोह का अर्थ है गुणों के साथ तादात्म्य। ज्ञानी का तादात्म्य टूट चुका है, इसलिए वे मुक्त हैं—भले गुण चलते रहें।
अगर परमात्मा गुणों से परे हैं, तो गुणों को बनाया किसने? क्या परमात्मा ने ही माया रची जो उन्हें छुपाती है?
यह गहन प्रश्न है। अगले श्लोक (7.14) में कृष्ण कहेंगे कि यह गुणमयी माया 'मेरी' है—'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया'। माया परमात्मा की शक्ति है। जैसे सूर्य से किरणें निकलती हैं जो आँखों को चौंधिया सकती हैं, वैसे ही माया परमात्मा से निकली है पर उन्हें ढक लेती है। यह विरोधाभास नहीं, यह लीला है—परम सत्य का अपने आप को छुपाकर फिर खोजने का खेल।